Friday, June 12, 2020

आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान :: कोर्ट ने कहा , आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं , क्लिक करे और पढ़े पूरी खबर

आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान  :: कोर्ट ने कहा  , आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं , क्लिक करे और पढ़े पूरी खबर 



सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि देश में आरक्षण का अधिकार संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार नहीं है। इस टिप्पणी के साथ ही कोर्ट ने तमिलनाडु में मेडिकल सीटों में ओबीसी के लिए अलग से 50 फीसद आरक्षण मांगने वाली विभिन्न राजनीतिक दलों की याचिका को सुनने से इन्कार कर दिया।

जस्टिस एल. नागेश्वर राव की पीठ ने गुरुवार को 2020-21 सत्र में मेडिकल के स्नातक, पीजी और डेंटल पाठ्यक्रमों के लिए अखिल भारतीय कोटे में तमिलनाडु की छोड़ी गई सीटों में राज्य के कानून के तहत अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के लिए 50 फीसद सीटें आरक्षित नहीं करने के केंद्र के निर्णय के खिलाफ माकपा, भाकपा, द्रमुक व तमिलनाडु कांग्रेस की याचिकाओं पर रुख अपनाया।

नागेश्वर राव, कृष्ण मुरारी और एस रवींद्र भट की खंडपीठ ने सियासी दलों की दलील ठुकराते हुए कहा, संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका (सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका) मूलभूत अधिकारों के उल्लंघन के मामले में ही दायर की जा सकती है। सियासी दलों के ऐसे किसी हक उल्लंघन नहीं हुआ है। अत: उन्हें याचिकाएं वापस लेनी होंगी। पीठ ने कहा, भारत के संविधान में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है।

खंडपीठ ने इस मामले की वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सुनवाई के दौरान कहा, आप याचिका को वापस लीजिए और मद्रास हाईकोर्ट जाएं। इन दलों ने अपनी याचिका में कहा था कि केंद्र सरकार के संस्थानों को छोड़कर अन्य सभी ओबीसी उम्मीदवारों को ऑल इंडिया कोटा के तहत दी गई सीटों से बाहर मेडिकल कॉलेजों में दाखिला मिलना चाहिए। ओबीसी उम्मीदवारों को प्रवेश से इन्कार करना उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। आरक्षण दिए जाने तक नीट के तहत काउंसलिंग पर रोक लगाई जाए।

द्रमुक ने दलील दी कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआइ) के नियम भी राज्य की आरक्षण नीति के साथ तालमेल रखते हैं। मेडिकल की पीजी सीटों में ओबीसी के पचास फीसद आरक्षण के पक्ष में माकपा ने भी पूरे देश की सीटों में ओबीसी को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाने की बात कही। दूसरी ओर, तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक ने कोर्ट में आरोप लगाया कि ओबीसी को 50 फीसद आरक्षण देने का कोई तार्किक आधार नहीं है। जब से आरक्षण की व्यवस्था शुरू हुई ओबीसी को समूचे देश में उचित प्रतिनिधित्व दिया गया है।