Saturday, April 6, 2019

नौकरी छोड़ पॉलीटेक्निक के छात्र ने बनायीं कंपनी , सैकड़ो बेरोजगारों को दिया रोजगार , क्लिक करे और पढ़े पूरी खबर

नौकरी छोड़ पॉलीटेक्निक के छात्र ने बनायीं  कंपनी , सैकड़ो बेरोजगारों को  दिया रोजगार , क्लिक करे और पढ़े पूरी खबर   




राजकीय पॉलीटेक्निक संस्थान कानपुर के पढ़े छात्र ने नौकरी छोड़कर फैब्रिक कंपनी बनाई और सैकड़ों लोगों को रोजगार दिया। मेहनत व लगन का नतीजा रहा कि इस कंपनी का सालाना कारोबार 20 लाख रुपये तक का पहुंच गया है। धागा बनाने और उसे कलर करने के क्षेत्र में नए प्रयोग कर रहे। रेडीमेड शर्ट और टी-शर्ट में फैशन के नए ट्रेंड के हिसाब से एडिटिंग करके उसे अन्तरराष्ट्रीय बाजार के मानकों के हिसाब से बना रहे।.

कालपी के राम चबूतरा निवासी अनुराग माठे ने राजकीय पॉलीटेक्निक कानपुर से टेक्सटाइल कमेस्ट्री में फाइनल परीक्षा वर्ष 2009 में पास की। कानपुर में उन्हें एक कंपनी में 5200 रुपये महीने की नौकरी मिली। कुछ दिन काम किया। एक के बाद एक कई कंपनी बदलते गए। अंत में उन्हें पं. बंगाल की एक बड़ी कंपनी में मौका मिला। खुद का कारोबार खड़ा करने की इच्छा मन में थी। नौकरी से कुछ पैसा जोड़ा और आनंद हैंडलूम के नाम से कालपी में फर्म डाला। इसके साथ ही यार्न डाइंग और वीविंग के साथ शर्ट और टी-शर्ट में एडिटिंग का नया काम शुरू किया है। पांच साल में ही उनका कारोबार लाखों प्रतिवर्ष में पहुंच गया है। उनकी वीविंग और डाइंग फर्म से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब पांच सौ लोगों को रोजगार मिल रहा है।

अनुराग माठे को बड़ी कंपनियों में काम करने से महंगी विदेशी कंपनियों के बारे में जानकारी मिली। यार्न डाइंग में इस्तेमाल होने वाली कई मशीनों को खुद ही डिजाइन करके सस्ते में बना लिया। डाइंग को उपयोग में आ रही 20 लाख की मशीन को 15 हजार में तैयार कर लिया। उससे रिजल्ट विदेशी मशीनों से बेहतर मिल रहा है।.

अनुराग ने बताया कि पॉलीटेक्निक छात्रों को स्टार्टअप शुरू करने के लिए आगे लाएंगे। ट्रेनिंग के लिए खुद यूनिट में उन्हें सीखने का मौका देंगे। कहा कि टेक्नोलॉजी को सीखकर अपनी क्षमता के हिसाब से बेहतर काम किया जा सकता है। अनुराग का कहना है कि पॉलीटेक्निक संस्थानों में प्रयोगशालाओं को आधुनिक बनाने की जरूरत है। बाजार की डिमांड के हिसाब से छात्रों को तैयार होने पर वर्षों लग जाते हैं। अगर अच्छी मशीनों पर प्रैक्टिकल हो और फील्ड ट्रेनिंग हो तो स्टार्टअप शुरू करने में छात्रों को समय नहीं लगेगा।.

अनुराग माठे कहते हैं कि पिता का डाइंग का छोटा कारोबार था। घर में देशी तकनीक पर डाइंग व वीविंग का काम हो रहा था। पिता के साथ काम में हाथ बंटाता था। इससे आमदनी कम होती थी। उससे जैसे-तैसे घर का खर्च चल रहा है। मन में था कि बीटेक करके इसी काम को आगे बढ़ाऊंगा मगर आर्थिक तंगी से नहीं पढ़ पाया। जैसे-तैसे इंटर पास किया पॉलीटेक्निक में टेक्सटाइल कमेस्ट्री में एडमिशन मिल गया। वैसे पिता नहीं चाहते थे मगर मैने उन्हीं के काम को आगे बढ़ाने की ठानी। आज सफलता मिल रही है। .