Saturday, November 10, 2018

उत्तर प्रदेश पुलिस दारोगा भर्ती 2016 के अंतिम परिणाम में आखिर क्यों हो रही देरी , उत्तरप्रदेश पुलिस दारोगा भर्ती 2016 को हाइकोर्ट में 25 याचिका का मुख्य बिंदु , क्लिक करे और पढ़े

  उत्तर प्रदेश पुलिस दारोगा भर्ती 2016 के अंतिम परिणाम में आखिर क्यों हो रही देरी , उत्तरप्रदेश पुलिस दारोगा भर्ती 2016 को हाइकोर्ट में 25 याचिका का मुख्य बिंदु , क्लिक करे और पढ़े 





विषय- हमें कोर्ट में सिर्फ यह सिद्ध करना है कि 50% का मानक नार्मलाईजेशन के बाद देखना क्यों गलत है।
पेपर का प्रारूप:- पेपर में 160 प्रश्न थे जो चार खण्डों में विभाजित था। और प्रत्येक प्रश्न 2.5 अंक का था। अभ्यर्थी को अगले चरण में सम्मिलित होने के लिए प्रत्येक खण्ड के 40 प्रश्नो में से 50% अंक (20 प्रश्न)  प्राप्त करना अनिवार्य था। ऐसा मानक किसी एक खण्ड / चारों खण्डों में पूरा न कर पाने पर वह अगले चरण के लिए अयोग्य होगा, चाहे उसके कुल अंक कितना भी अधिक क्यों न हो।

परीक्षा परिणाम का आधार:- भर्ती बोर्ड ने Upsi-2016 भर्ती में  DV/PST के लिए अभ्यर्थियों का चयन दो आधार पर किया।


1- जो अभ्यर्थी  Raw score ( वास्तविक अंक) में प्रत्येक सेक्सन में 50% अंक प्राप्त किए।
2- जो अभ्यर्थी नार्मलाईजेशन के बाद नार्मलाईज अंको (आभासी अंक) में 50% प्राप्त किए।
NOTE:-  1:- Raw score अभ्यर्थी द्वारा खुद से प्राप्त किए गए वास्तविक अंक / real marks होते हैं।
 2:- Normalized score बोर्ड द्वारा गणितीय विधि से अभ्यर्थी के Raw score का प्रयोग करके निकाले गए आभासी अंक/vertual marks होते है। जिसका प्रयोग आज तक सिर्फ रैंकिंग (मेरिट सूची) निर्धारण के लिए किया जाता रहा है।


जबकि एक ही भर्ती में एक ही पद के लिए दो आधार पर अभ्यर्थियों का चयन किया जाना समानता के अधिकार के खिलाफ है।


बोर्ड का मत:- बोर्ड ने कोर्ट में कहा कि उसके द्वारा दो आधार पर अभ्यर्थियों के चयन किये जाने के पीछे कारण यह है कि परीक्षा के पहले जारी की गई नोटिस में इस बात का स्पष्ट उल्लेख नहीं था कि 50% नार्मलाईजेशन के पहले देखना है या बाद में देखना है।


हमारी मांग :- हम लोगों ने बोर्ड द्वारा दिए गए मानक को पूरा करते हुए प्रत्येक सेक्शन में Raw score (वास्तविक अंको) पर 50% अंक प्राप्त किए हैं। अतः सिर्फ हम लोगों का ही चयन किया जाए। और बोर्ड के  normalization process के द्वारा पास किए गए अभ्यर्थियों को चयन से बाहर किया जाए। क्योंकि भर्ती बोर्ड अभ्यर्थियों के चयन का एक ही आधार प्रयोग कर सकता है जो कि प्रथम आधार (50% in Raw score ) तर्क संगत है क्योंकि दूसरे आधार (50% in normalized score/आभासी अंक) पर चयन करने पर वे अभ्यर्थी जो Raw score (वास्तविक अंक) पर 50% अंक प्राप्त किए हैं, बाहर हो सकते हैं। क्योंकि नार्मलाईजेशन के बाद उनके नार्मलाईज अंक ( आभासी अंक) 50% के मानक से कम हो सकते हैं। जबकि यह अभ्यर्थी किसी आधार पर बाहर नहीं किए जा सकते हैं।


और दूसरी बात यह है कि इन्हें (50% in normalized score अभ्यर्थी) normalization process ka दोहरा लाभ दिया जा रहा है, पहली बार 50% का मानक पूरा करने में और दूसरी बार मेंरिट सूची में शामिल करने के दौरान। जबकि हम लोगों (50% in Raw score अभ्यर्थी) में नार्मलाईजेशन का प्रयोग सिर्फ मेंरिट सूची बनाने में ही किया जा रहा है। जो कि समानता के अधिकार के खिलाफ हैं।


सामान्य तौर पर प्रतिशत और नार्मलाईजेशन का आधार :-
 प्रतिशत किसी एक विषय विशेष के अधिकतम प्राप्तांक में प्राप्त किए गए अंक होता है।
जबकि नार्मलाईजेशन दो या दो से अधिक पेपर होने पर उसमें सम्मिलित होने वाले विधार्थियों की रैंकिंग (स्थान) निर्धारण के लिए होता है। ताकि मेरिट के आधार पर ऊपर से आवश्यक अभ्यर्थियों का चयन किया जा सके। जिसके लिए नार्मलाईज अंक (आभासी अंक) निकालना होता है क्योंकि अलग-अलग पेपर में प्राप्त अंक (वास्तविक अंक) के आधार पर योग्यता का स्तर (मेरिट सूची/रैंकिंग) निर्धारित करना कठिन होता है। परन्तु नार्मलाईजेशन का अर्थ यह नहीं होता है कि किसी अयोग्य को योग्य बनाया जाए। जैसा कि बोर्ड ने किया कि उन अभ्यर्थियों को जिन्होंने अपने प्रत्येक सेक्सन में 50% अंक (वास्तविक अंक) न ला पाने पर भी नार्मलाईजेशन द्वारा 50%  बनाया गया। जिससे वे अभ्यर्थी अयोग्य श्रेणी से चयन की योग्य श्रेणी में सम्मिलित हो गये। इससे जो अभ्यर्थी Raw score (वास्तविक अंक) पर 50% अंक प्राप्त करके योग्यता की श्रेणी में आये है अब उनका हित प्रभावित हो रहा है।


जैसे-अगर किसी के 40 में से 18 प्रश्न सही है, 100 में से 45 अंक हुए। क्योंकि प्रत्येक प्रश्न 2.5 अंक का था। मतलब उसके 45% अंक हुए। पर बोर्ड ने नार्मलाईजेशन करके 50  नार्मलाईज अंक (आभासी अंक) बनाए और कहा वह 50% का मानक पूरा कर रहा है। जबकि अभ्यर्थी के अभी भी 18 प्रश्न ही सही है न कि 20 प्रश्न। नार्मलाईजेशन से 2 प्रश्न कैसे सही हो सकते हैं। जबकि बोर्ड की नोटिस के आधार पर अगले चरण में सम्मिलित होने के लिए अभ्यर्थी के 40 प्रश्न में से 20 प्रश्न (50%) सही होने चाहिए।


 NOTE- नार्मलाईजेशन के नार्मलाईज अंक (आभासी अंक) से 50% प्रतिशत का मानक देखना गणितीय आधार पर गलत है।  क्योंकि नार्मलाईजेशन में दो या दो से अधिक पेपरों का comparison किया जाता है जबकि प्रतिशत को comparison करके नहीं निकला जाता है यह किसी विषय विशेष का निकाला जाता है। अतः percentage को comparison के द्वारा निकाले गए Normalized marks (आभासी अंक) पर देखना गणितीय आधार पर गलत तरीका है।


नार्मलाईजेशन एक जटिल गणितीय विधि होती हैं। जिसके कई प्रकार और विधियां होती है। जिनमें से प्रत्येक का प्रयोग करने पर प्राप्त होने वाले नार्मलाईज अंक (आभासी अंक) का भिन्न-भिन्न आना सम्भव है। जिस पर 50% का मानक देखें जाने पर लोगों के हित प्रभावित होना स्वाभाविक है। जबकि अभ्यर्थी के Raw score (वास्तविक अंक) पर प्रतिशत कभी नहीं बदलता है। अत: 50% के मानक को  वास्तविक अंक ( Raw score) पर ही देखा जाना चाहिए।


पेपर से पूर्व अभ्यर्थी की मानसिक स्थिति:-
किसी भी अभ्यर्थी को पेपर देते समय यह नहीं पता था कि उसके पेपर का कौन-सा खण्ड दूसरी सिफ्ट के पेपर से सरल/कठिन है। उसे सिर्फ इतना पता था कि उसे अगले चरण में चयन के लिए प्रत्येक खण्ड में पहले 50% अंक (वास्तविक अंक) प्राप्त करने है।


अभ्यर्थी के मन में नार्मलाईजेशन के बाद 50% देखने की बात भला कैसे आ सकती थी। क्योंकि 2 घण्टे में उसे 160 प्रश्न करने थे, साथ ही वह अन्य सिफ्ट के पेपरों को देखें बिना यह कैसे निर्धारित कर सकता था कि उसके नार्मलाईजेशन के बाद इस खण्ड में 22 प्रश्न पर 50% होगा, इस खण्ड में 18 प्रश्न पर 50% होगा और इस खण्ड में 19 प्रश्न पर 50% होगा।


किसी पेपर में किसी खण्ड के सरल/कठिन होने की बात तो बोर्ड के रिज़ल्ट आने के बाद सामने आ रही है। पेपर देते वक्त किसी को भी ये बात नहीं पता थीं कि उसका ये खण्ड अन्य सिफ्ट के पेपर से कठिन है, जिससे वह इस खण्ड में कम प्रश्न सही करने पर नार्मलाईजेशन द्वारा पास हो जायेगा और अन्य सरल खण्डों में ज्यादा समय देकर अधिक अंक प्राप्त कर लेता।

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